अब क्या बताऐं! इन दिनों हमें किन किन लाचारियों से गुजरना पड़ रहा है ! अपने अपने घरों से दूर दराज राज्यों के' रिसॉर्ट्स ' में समय काटने को मजबूर हैं। ' पंचसितारा ' सुविधाओंं के सुरक्षित ' पर्सनल ' कमरों में " कोरोना " जैसे ' क्वरनटॉइंन ' में रह रहे हैं। मजबूरी है भाई ! अपने अपने राज्य के गरीब किसानों , दलितों ,माफिया पीड़ित जनता की सेवा के लिए जनविरोधी ताकतों के प्रयासों को नाकाम जो करना है ।
अरे ! यह कया कह रहे हैं , आप ? यह चिंता हमें नहीं होगी तो किसे होगी ,भला ? हम ही तो जनता के नुमाइंदे हैं । हमें जनता के लिए कुर्बानी देनी होगी तो देंगे। इसके लिए पार्टी छोडऩे का फैसला लिया है ,अब यही ' जुगाड़ ' है कि उनका दामन थामेंं जिनके पास जनता की भलाई का ' फार्मूला ' है। अब यह हमारी पार्टी तो बिल्कुल बदल चुकी है। अब वो बात नहीं ! इसमेँ रहकर जनसेवा नहीं हो सकती । हमने क्या नहीं किया ? यहाँ ' दशकों ' से रहकर देख लिया - पर आवाम की आवाजें सुनी ही नहीं जाती हैं। आम लोगों के हालात वही हैं- ' गरीबी रेखा ' बहीं की बहीं है , जरा भी नहीं खिसकी । अब हमारी हालत ही देख लो - ' क्या बदला ? अरे एक लड़के को भी तो कोई अच्छा सा ठेका नहीं दिलवा सके ! यहाँ तक कि गाँव के स्कूलों में फर्नीचर नहीं , शोचालय भी शोचनीय है । सडकों के लिए भी ठेका भूतपूर्व प्रधान के रिश्तेदार को मिल गया । अब आप बताइये क्या करें ?
हम इन हालातों में चुपचाप हाथपर हाथ धरे बैठे तो रह नहीं सकते । आखिर हमारी जिम्मेदारी बनती हैं , जनता ने हमें बोट दिया है तो क्या हम उनके हितों के लिए ' त्याग ' नहीं करें ? हमने बहुत सोचा ,बहुत वार. पार्टी के 'आलाकमान ' तक संदेश भिजवाऐ , अपने ' ट्विटर ' एकाउंट का ' लोगो ' भी हटाकर संकेत दिए - पर.उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं । उधर दूसरी तरफ से उनके दूत पर दूत संदेश लेकर आते रहते - " अरे भाई ! आजाओ ,क्यों अपना और जनता का भविष्य भाड़ में झौंक रहे हो ? सब सुविधाओं के साथ ' प्रधान सेवक " के साथ उठने बैठने का मौका मिलेगा । ठेका ,पोस्टिंग ,ट्रांसफर आदि सबमें आपका हिस्सा पक्का । ' दूर दृष्टि - पक्का इरादा ' - समय की चाल को समझो !" अब आप ही बताईए हम ऐसा मौका कैसे गंवा देते ? अब.हमें चाहे कितने भी दिन ' रिसॉर्ट्स ' मे रहते हुए काटने पड़ें - हम पीछे हटने वाले नहीं। मुफलिसी में जीवन बिताने को मजबूर जनता की खातिर हमें पार्टी तोडऩे और दूसरे दल के साथ जुडऩे का यह मौका कैसे गंवाए- गंभीरतापूर्वक सोचते हुए यही रास्ता साफ दीखता है।
क्या कहा ' सिंद्धांत - निष्ठा ' ? सिद्धांत- निष्ठा किसके लिए ,किसके प्रति ? जनता के लिए -जनता के प्रति ! यही तो जनतंत्र का तकाज़ा है । हम भी तो इसी पर काम.कर रहे हैं। जिस काम में जनता का हित , जनता की भलाई होती हो वो पहले ! पार्टियों का क्या है ? इसके लिए यदि पार्टी तोड़ने की भी जरूरत हो तो वोभी करेंगे ।अब यदि पार्टी " हमारे"
और " जनता " के बीच रूकावट बने तो उससे निष्ठा कैसी ?हम.उन पुराने ' पिछलग्गू ' नेताओं जैसे तो हैं नहीं कि पूरी जिंदगी बस " जाजम बिछाने- उठाने " , रैलियों के इंतजाम ,भीडभाड़ की व्यवस्था " में ही लगे रहे ंं ।हमारे सपने - हमारी आकाँँक्षाऐं तो आम जनता के साथ जुडी हुई हैं । उन ' सबा करोड़.हिंदुस्तानियों ' और ' सबका साथ सबका विकास ' की बात को कोई कैसे भुला सकता है । सबका विकास तो हमारे विकास की बात पीछे कैसे रह सकती है।
" नैतिकता और अवसरवादिता? " अरे भाई ! आप.भी यह कौन से जमाने की बात उठा रहे हैं ? नैतिकता का मतलब तो आदर्श स्थिति जिसमें -' बंदा मुँह - आँख - कान बंद करे गांधी के तीन बंदरों सा पार्टी का बंधक फरमाबरदार बना रहे । यह तो नया जमाना है, नयी रीति है - " देश - धर्म " की खातिर पार्टी तो क्या इस दुनिया-जहान को भी छोड़ना देशभक्ति है ! " जोड़ - तोड़ " राजनीति का एक प्रमुख औजार है । राजनीति का यह गुर जानेवाले धुरंधरों को ही आधुनिक ' चाणक्य ' की उपाधि से नवाजा गया है। देश- प्रदेश को ऊँचाई पर ले जाने के लिए इस तकनीकी कुशलता में पारंगत होना एक विशेष योग्यता मानी गई है । यह अवसरवादिता नहीं वरन दूरदर्शिता कहलाती है ।राजनीति की ' दशा और दिशा ' को देखकर , उसकी मांग के अनुरूप " स्ट्रेटेजी " बनानी होती है। अगर आप में इतनी भी समझ नहीं तो बस ' हाशिए ' पर पडे़ रहिए । लेकिन हम.इतने बेगैरत और गये- गुजरे भी नहीं कि " बक्त की नब्ज " न पकड़ सकें कि -' हम देखते रह जायें और माल दूसरे चूसते रहेंं !' हम.तो ठहरे ' प्रोफेशनल ' - ' डिजिटल युग ' में ' डाटा ' पर पूरी पकड़ रखते हैं। अब देखो न हमारे पंत प्रधान ने तो पहले ही सावचेत किया कि --" इस युग में जो डाटा पर मजबूत पकड़ रखेगा वहीं राज करेगा !" अब.हम.तो मौका भांपते ही ' दलबदल ' करने से नहीं चुकने वाले । अब चाहे हमें ' मौकापरस्त ' ही क्यों न कहें ! हम तो तुरन्त ' ऐक्शन ' में आ जाते हैं। अरे यह तो कहा भी गया है कि ' नीति ' वहीं जो ' राज.' के साथ हो तब ही तो राजनीति कहलाती है । और भईया - हमारे नीतीश तो ' नीति ' के राजगुरु हैं, पासबान कोऊ भुला सके है भला ।
जय ! जय !