Friday, 7 February 2020

मन की उड़ान

हुआ यह कि एक तितली मेरे आगे आगे उड़ती जाये , मैं जिधर मुड़ूँ वह भी उधर मुड़े । पत नहीं उसे यह कैसे भ्रम हुआ कि मैं उसका पीछा कर रहा हूँ। मैंने बहुत कोशिश की मैं अपने रास्ते पर जाऊं पर वह तो मेरे ही रास्ते पर आगे आगे ...। अब मुझे लगा कि वास्तव में मैं ही उसका पीछा तो नहीं कर रहा हूँ ? या वह मेरा मार्गदर्शन कर रही थी ! अब तो हद हो गई जब वो मेरे सिर पर ही मंडराने लगी । मैं उड़ाऊँ ,पर वो फिर लौट कर फिर मंडराने लगे । शायद यह मेरे बालों की गंध ही उसे आकर्षित कर रही थी।,पता नहीं ?  बहुत देर तक यह खेल चलता रहा फिर अचानक ही वो कहीं दूर खो गई।

मेरे साथ कमरे में भी ऐसा ही होता है ।जब कोई मक्खी बार बार ..सिर पर ,कभी हाथ पर, कभी अखबार पर ,किताब पर आकर बैठ जाती है । उड़ाने पर ?फिर उसी पल फिर आ कर बैठ जाती है ।मैं बहुत हैरान होता हूँ ..यह भी हद हो गई परेशान करने की ! गुस्सा भी बहुत आता ..गुस्से में अखबार, किताब से ही उस पर टूट पड़ता ! पर यह क्या ? उस पर तो कोई असर ही नहीं ? इधर से उड़कर फिर दाहिने हाथ पर ,या पैर पर ! ..बस उसे आसपास ही बने रहना है । क्या वह.मुझे चाहती है ? या यही कुछ मेरीही चाहत है ? यहां मेरे पास क्या है , जो उसे आकर्षित कर रहा है ? कुछ भी तो मेरे पास ऐसा नहीं ? मैं सोच में डूब गया.. अरे ! यह उसकी मेरे पास बैठने की इच्छा ही ...या यह भी मेरे शरीर की गंध.है जो उसे खींच लाती है । शरीर की अपनी गंध होती है.. पशु..पक्षी सभी एक विशिष्ट गंध रखते हैं.. गंध के प्रति संवेदनशील.! मैं. विचारों में डूब गया.. क्या ' गंधर्व ' जो ' गंधमादन ' पर्वत पर रहते थे , उनका ही वंशज तो नहीं ? 

रात को एक मच्छर कान.के पास आकर भिनभिनाहट करते हुए पता नहीं क्या कहना चाहता है ?  शायद , " बच्चू ! कहाँ तक बचोगे ! मैं तो तुम्हारा खून पीकर ही रहूंगा ! जरा सा ! बस जरा सा ! " सब.तरफ से ढ़क कर सोने पर भी पत नहीं वो भिन भिन की आवाज आने लगती है । अब कितनी ही कोशिश करें पर यह महाशय आही जाते हैं। अचानक मुझे लगा अरे हनुमानजी भी तो सब तरह से रक्षित लंका में ' मसक समान रुप धरि ' ; प्रवेश करने में सफल हुए थे ! यह भी कोई ऐसा ही ..! 

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