Thursday, 14 May 2020

अतीत के झरोखे से - उठते प्रश्नचिन्ह ?

यह कैसे लोग थे ? कौन थे ? क्या सच.में ही ऐसे होते थे ? क्या यह सब कल्पनाओं का जाल तो नहीं ?

 अपने आप अपनी मृत्यु का रहस्य खोलने वाले! सच में क्या ?   महाभारत सीरियल के '  लॉकडाउन  '  कालखंड में इसके पुनः प्रसारण ने हमारे सामने अनेकानेक प्रश्नचिन्ह. खड़े कर दिए हैं । विश्व की महान  धरोहरों मे से एक भारत के गौरवशाली अतीत , उसके महापुरुषों की अमर कथा महर्षि वेदव्यास की ' महाभारत 'की महान गाथा ! 

 क्या यह निर्लज्जता नहीं थी  कि शिखंडी की आड़ लेकर
भीष्मपितामह  को अर्जुन जैसा योद्धा अपने वाणों से बींध देता है। अब अतीत के इस कृत्य को भी आज के' ' युद्ध और प्रेम मेंं सब जॉयज है ' इसी कसौटी पर सही ठहराया जाये ?
हो भी क्यों न जहाँ श्रीकृष्ण जैसा चतुरसुजान राजनीतिज्ञ हो वहाँ सब सभंव है , है कोई संशय ? धराशायी हुई इच्छामृत्यु का अधिकारी ! सत्य ,निष्ठा ,संकल्प और प्रतिज्ञाओं से आबद्ध महामानव ;  अंधत्व -महात्वाकांक्षी , पुत्रमोही  हस्तिनापुर साम्राज्य का रक्षक आज युद्धके मैदान में अभी भी हस्तिनापुर के सुरक्षित रहने की अमर कामना लेकर उत्तरायण के इंतजार कर रहा है । 

भारतवर्ष के इतिहास का यह पृष्ठ अद्भुत, अद्वितीय वीरता का एक दिव्य प्रमाण है । अर्जुन को भी अपने इस कृत्य पर शायद जीवन भर पछतावा रहा होगा ! विजयी अर्जुन को भी यह कायरता कचोटती रही होगी।
 विवशताओं की यह महागाथा , बचनों की श्रंखलाओं से बंधे महापुरुषों की बात ही कुछ निराली है -- अपूर्व ! मारनेवाला भी अश्रुपूरित आँखों से दूसरे पक्ष के अपने ही संबंधी पर वाणों की वर्षा करता है तो दूसरा भी सहर्षता से उसी पल प्रत्युत्तर में बौछार करदेता है।
  संदेह , अपने ही पक्ष के योद्धाओं की निष्ठा पर शंका , बारबार नेतृत्व द्वारा प्रमाण की कामना  , -- कौरवों के दल में निर्णय की  और उनकी दक्षता पर शंकाओं के संबंध में बारबार प्रश्न उठाने की आदत ने महावीरों कोभी भ्रमित कर दिया था।

छल ,कपट से रची गई रणनीति द्रुयोधन का अस्त्रशस्त्र. था और उसकी काट का एकमात्र विकल्प श्रीकृष्ण की राजनीतिक सूझबूझ. उनकी दूरदृष्टतापूर्ण समझभरी सलाह थीं। एक तरफ अंधी मोह- माया विवेकपूर्ण विदुर वाणी को भी अनसुना कर दिया गया। हित- अनहित का विवेचन ही खोऐ धृतराष्ट्र ठूंठ के समान चेतना शून्य सा हो गया था।

अभिमन्यु वध एक कायराना कारनामा ,देखते देखते अश्रुपूरित आँखों से कैसे देखा गया...कोई शब्द... आर्तनाद ....निहत्थे युवक पर उस समय के दुर्दांत , सात - सात महावीरों ने एकसाथ मिलकर ..मानवता...?  

महाभारत इन भयावह घटनाओं का दिग्दर्शन कराता है । जहाँ भीष्मपितामह अपनी ही मर्यादाओं के भ्रमजाल मेंं फँसे हुए थे।

राष्ट्र से बडा़ कुछ भी नहीं ? कोई भी नहीं ? कोई प्रतिज्ञा का अहंकार तो बिल्कुलभी नहीं ? भीष्पितामह का शरशय्या पर युधिष्ठिर से राज्य , नीति ,आंतरिक और व्यक्तिगत आकांक्षाओं से सर्वथा निर्लिप्त संदेश विचारणीय है !  महाराज भरत के वशंज , शान्तनु के महान पुत्र ' देवव्रत ' राजनीति की शिक्षा  - अपने अतीत की गलतियों , भ्रान्तियों की स्वीकृति करते हुए विदा होते हैं। महाभारत का अंत -- अतीत का अंत , नवयुग का शुभारंभ ! 

यह महान कथा हमारे बीच बैठे ,धृतराष्ट्रों , शकुनियों , दुर्योधनों को पहचानने, जाननें और श्री कृष्ण के  पार्थसारथी रुप में अनुपम ' गीता ज्ञान ' को आत्मसात कर , कर्मयोगी बनने की शिक्षा देती है। 
जय ! जय !
© बोधिपैगाम 


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