पर्यावरण की रक्षा और संरक्षण के क्षेत्र में हमारे देश की महिलाओं का योगदान , उनकी भागीदारी स्मरणीय ही नहीं वंदनीय भी है। राजस्थान की मरुधरा वीरों की महान गाथाओं के लिए तो जानी ही जाती है पर यहाँ के गौरवशाली इतिहास में महिलाओं के उत्सर्ग की भी अनेक घटनाएं लिपिबद्ध हैं। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र मेंं भी ' अमृता देवी ' और उनकी अन्य सहयोगी महिलाओं का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। यह ' खेजड़ली ' आंदोलन के नाम से याद किया जाता है ।
" सिर साटे रूख रहे, तो भी सस्तो जान ! "
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यह हमारी राजस्थानी लोकोक्तियों में प्रचलित है:: इसका तात्पर्य है कि : " यदि सिर कटबाने पर वृक्षों की रक्षा होती हो तो भी यह सौदा बहुत सस्ता है !" यह एक कथन मात्र ही नहीं ,जीवनशैली है ! वृक्ष पूजनीय हैं ,वंदनीय हैं ,उनकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है ! यही है विश्नोईयों के गांवों में जीवन मंत्र ! आइए इसी से जुड़े महिलाओं के बलिदान की शोर्यगाथा : खेजडली आंदोलन
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रजवाड़ों के समय के राजस्थान में 1730 में जोधपुर रियासत के एक छोटे से गांव ' खेजड़ली ' के स्थनीय शासक के आदेश पर मरुधरा के जीवन से जुड़े ' खेजड़ी ' ( यह संस्कृत और पौराणिक साहित्य का बहुत प्रसिद्ध- " शमी " वृक्ष -- जिसका पूजन श्री राम ने लंकेश पर विजय अभियान से पूर्व किया था।) वृक्षों को काटने पहुंचे ' राज' ' के कारिंदों को विश्नोई समाज की महिलाओं के दल ने रोकने का प्रयत्न किया । ' अमृता देवी ' इस समूह का नेतृत्व कर रहींं थीं । अड़ियल कारिंदे काटने पर आमादा थे। इन वीरवालाओं ने खेजड़ी वृक्षों को काटने से बचाने के लिए उनसे चिपक कर चुनौती देने का साहसपूर्ण निर्णय किया। कारिंदे कहाँ मानने वाले थे..एक एक करके 383 लोगों ने अपने जीवन की आहुति इन वृक्षों की रक्षा में झोंक दी। इस स्वतः स्फूर्त आंदोलन में अमृतादेवी की तीन बेटियों ने भी अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। मानव जाति के इतिहास में वृक्षोंको बचाने हेतु जीवन समर्पित कर देने वाली वीरांगनाओं का शायद यही अनूठा- अकेला विश्वकीर्तिमान हो !
उत्तराखंड का चिपको आंदोलन :
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यह 1974 के उत्तराखंड के ' चमोली 'में महिलाओं द्वारा वृक्षों की कटाई के विरोध में चलाया गया ' चिपको आंदोलन ' ! 25 मार्च को ' गौरा देवी ' के नेतृत्व में 27 महिलाओं के समूह.ने मजदूरों को पेड़ों को काटने से रोकने के लिए पेड़ों से ' चिपट कर ' खड़े होने का निश्चय किया । सुंदरलाल बहुगुणा और साथियों के साथ यह भी व।क्षों को बचाने की एकमात्र कोशिश रही थी।
उत्तराखंड हिमालय क्षेत्र के संवेदनशील भूस्खलन. की भूमि है।अनेकानेक विकास की गतिविधियों से यहाँ बहुत कठिन पारिस्थितिकीय संकट के संकेत विनाशकारी वाढ़ ,भूस्खलन ,भूकंप आदि के रुप मेंं सामने आते रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग ,आदि अनेक कारणों से खतरा बढ़ ही रहा है ।जरूरत इसके रोकथाम के उपायों को कारगर तरीकों से संचालित करने की है। आशा है कि हम अपनी प्रकृति से प्रेमपूर्ण व्यवहार करेंगे और सार्थक प्रयास भी ! शुभम्सतु कल्याणं !
जय ! जय !
बोधिपैगाम
05.06.2020
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